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जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ (Jb Bhi Likhta Hu Man ke Khayalat Likhta Hu)


आंखों की जुबां से धड़कन की रवां से
दिल की कलम और जज़्बातों के मकां से
बस दिन रात लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

चेहरा नही होता आईना हर किसी का
छुप जाता है ग़म हँसी में किसी किसी का
हँसी और ग़म की मुलाकात लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

दुख में कभी खुशी में भीग जाती हैं पलकें
कभी शर्मिंदगी से भी नम हो जाती है पलकें
नम पलकों की रोशन हर बात लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

खुद में आबाद हुए तो तन्हाई ही मिलेगी
तन्हाई में पहचान न तन्हाई को मिलेगी
तन्हाई के खुद से ताल्लुकात लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

चाँद सितारे सजाये है जिसने धरती के आंचल में
भर दिया प्याला खुशियो का अम्बर में बादल में
उस अंजान की पहचान लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

द्वार जिसका खुला हैं हर खासो आमो को
आशीष मिलता है जिसका हर बच्चे बूढे जवान को
उसके करम और रहमत लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

कभी मुसाफिर कभी रुकी सी लगती है जिंदगी
जैसे भी हर हाल में खुशहाल रहती हैं ज़िंदगी
हर पल ज़िंदगी का साथ लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

जब बुलावा आएगा तो मैं भी चला जाऊँगा
अपने इन अल्फ़ाज़ों से ये जहाँ सजा जाऊँगा
इन अल्फ़ाज़ों में अपनी जन्नत लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ मन के खयालात लिखता हूँ

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