तेरी आखें कुछ तो कहती है (Teri aakhen kuch to kahti hai)



कभी चलते चलते थम जाए , कभी  कुछ  सोचे  कभी  सकुचाये
कभी  अठखेली  ले  कभी  शरमाये  फिर  शर्माकर  जब  वो  झुक  जाएँ
पढ़  ले  पल  में  सबके  नैनो  को  खामोश  भी  जब  वो  रहती  हैं 
कुछ  खाव्व  बसाकर  पलकों में  तेरी  आँखें  कुछ  तो  कहती  हैं 

कभी  मुस्कान  सी  बनकर  खिल  जाएँ , कभी  अश्रु  बने  और गिर जाए  
कभी  इंकार  है  टूटे  दिल  का  ये , कभी  इजहार  पलों  में  कर  जाएँ 
गहराई  सागर  की  इनमे  और  स्थिर धरा  सी रहती  है 
कुछ  खाव्व  बसाकर  पलकों में  तेरी  आँखें  कुछ  तो  कहती  हैं 

कभी  चाँद  के  जैसे  मुस्काएं , कभी  सूरज  जैसे  गुसाएं 
कभी  तारो  सी  झिलमिल  होकर  ये  चैन  सुकून  जो  बरसायें 
जीवन  की  तपती  कड़ी  धुप  में  ये  छाया  बनकर  रहती  हैं 
कुछ  खाव्व  बसाकर  पलकों में  तेरी  आँखें  कुछ  तो  कहती  हैं 

कभी  बड़े  बड़े  भौचक्के सी , कभी  उलझन  से  हक्के बक्के  सी  
कभी  लाँन्ग  उम्र  की  सीमाएं लड़  जाएँ  जग  से  बच्चों  सी 
अंगड़ाई  बचपन  की  लेकर  मस्ती  में  डूबी  रहती  हैं  
कुछ  खाव्व  बसाकर  पलकों में  तेरी  आँखें  कुछ  तो  कहती  हैं 

कभी  कृष्णा  की  लीला  है  इनमे , कभी  मीरा  जैसी  प्रेम  लगन 
कभी  गोकुल  का  इनमे  रास  रंग , कभी  राधा  जैसी  निस्वार्थ  जलन 
प्रेम  ही  प्यास , प्रेम  ही  तृप्ति , बस  प्रेम  ही  प्रेम  ये  कहती  हैं 
कुछ  खाव्व  बसाकर  पलकों में  तेरी  आँखें  कुछ  तो  कहती  हैं 

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