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जब प्यार हुआ तो पार हुआ जीवन के झाल झमेले से (jab pyar hua to paar hua)




जब  प्यार  हुआ  तो  पार  हुआ  जीवन  के  झाल  झमेले  से 
मंदिर , मज़्जिद , गिरजे , द्वारे  और  जात  पात  के  रेले  से 
खाना -पीना  आना -जाना  छूट  गया , शुध  भूल  गया 
मदमस्त  बना  हु  दूर  खड़ा  अब , अपनी  अपनी  दे  ले  से 

दिन  हो  भारी  रात  घनी , परछाई  उसकी  साथ  चले 
अंधियारे  घर  में  दीपक  को  जिन्दा  रखने  को , जैसे  बाती  जले 
क्या  आखिर  सच्चाई  है , फिर  पुछा  आज  अकेले  से 
जब  प्यार  हुआ  तो  पार  हुआ  जीवन  के  झाल  झमेले  से 

वो  कहता  मेरी  राहें  ऐसी , जिसपर  चलना  दूभर  है 
मिलने  की  कोई  आश  नहीं , खोने  का  चलन  ही  जिसपर  है 
मै  कहता  हु  वो  प्यार  ही  क्या , जो  डरता  पाने  खोने  से 
जब  प्यार  हुआ  तो  पार  हुआ  जीवन  के  झाल  झमेले  से 

मैं  सोचा  करता  बैठा  बैठा , कैसी  इसकी  माया  है 
परे  हटाकर  भेदभाव  , सबको  इसने  अपनाया  है 
मन  शीतल , पावन , शांत  हुआ , सबकुछ  इसको  देने  से 
जब  प्यार  हुआ  तो  पार  हुआ  जीवन  के  झाल  झमेले  से 

ओरो  की  खुशियों  को  जो  मुस्कान  बना  लेता  अपनी 
और  गमो  में  विचलित  होकर , नाम  आखें  कर  लेता  अपनी 
मतलब  केवल  इसका  प्रेम  से  है , और  प्रेम  के  लेने  देने  से 
जब  प्यार  हुआ  तो  पार  हुआ  जीवन  के  झाल  झमेले  से 

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