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ख़ुद को ज़माने की ज़ीनत कहते हो


ख़ुद को ज़माने की ज़ीनत कहते हो
कम्मतर ज़माने में मेरी क़ीमत कहते हो

ख़ुद चलाते हो नीगाहें तीरों सी
मुज़ीर ज़माने की नीयत कहते हो 

क्या ख़ूब अन्दाज़ ए ज़ुबा ये भी 
जलाते हो बसर इसे हक़ीक़त कहते हो 

फ़र्ज़ दुआओ का अधूरा क्यू ना हो
उठाते हो क़र्ज़ ख़ुद की हुक्मत कहते हो 


नासूर ए ज़लालत दिया करते हो पनाहों में

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