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क्या आप जानते है ? भारत का रोबिन हुड कौन है? - टांटिया भील




रॉबिनहुड की कहानिया हम सबने बचपन में बहुत पढ़ी होगी ओर कई ने रॉबिनहुड बन ने का भी सोचा होगा। पर क्या आपने कभी सोचा है की असल ज़िंदगी में भी कोई रॉबिन हुड हो सकता है | आज हम ऐसे ही एक हीरो की चर्चा करेंगे जिनकी ज़िंदगी रॉबिन हुड के कही कम नहीं है

टांटिया भील (या टंट्या भील, टंट्या मामा) (d। 1890) 1878 और 1889 के बीच ब्रिटिश भारत में सक्रिय क्रन्तिकारी थे (पर अंग्रेज उन्हें डकैत ही मानते थे) । टंट्या भील का जन्म पूर्व मध्य निम्र (खण्डवा) के पंधाना तहसील के ग्राम बडाडा में हुआ था, जो वर्तमान में मध्य प्रदेश में स्थित है। स्वाधीनता के स्वर्णिम अतीत में जाँबाजी का अमिट अध्याय बन चुके टंट्या भील, अंग्रेजी शासन को ध्वस्त करने वाली जिद तथा संघर्ष की मिसाल है। टंट्या भील के शौर्य की छबियां वर्ष 1857 के बाद उभरीं। जननायक टंट्या ने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ग्रामीण जनता के शोषण और उनके मौलिक अधिकारों के साथ हो रहे अन्याय-अत्याचार की खिलाफत की। दिलचस्प पहलू यह है कि स्वयं प्रताड़ित अंग्रेजों की सत्ता ने जननायक टंट्या को “इण्डियन रॉबिनहुड’’ का खिताब दिया | 


लोकप्रियता



यह एक निर्विवाद तथ्य है कि टंट्या भील सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने बारह वर्षों तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया और अपने अदम्य साहस और विदेशी शासन को उखाड़ने के जुनून के कारण खुद को जनता के सामने रखा। राजनीतिक दलों और शिक्षित वर्ग ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए जोरदार आंदोलन चलाया पर इन आंदोलनों से बहुत पहले, टंट्या भील जैसे आदिवासी समुदायों और क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह चालू किया था। टंट्या भील आदिवासियों और सामान्य लोगों की भावनाओं का प्रतीक बन गए थे 


लगभग एक सौ बीस साल पहले टंट्या भील आम जनता के एक महान नायक के रूप में उभरे और तब से भील कबीले का एक लंबे समय तक गौरव बना रहा।

कार्यशैली


टंट्या भील ब्रिटिश सरकार के सरकारी खजाने और उनके चाटुकारों का को लूटते थे और धन गरीबों और जरूरतमंदों में बांटते थे। उन्हें सभी आयु वर्ग के लोगों द्वारा लोकप्रिय रूप से "मामा" कहा जाता था। टंट्या का यह संबोधन इतना लोकप्रिय हुआ कि भीलों को "मामा" कहकर संबोधित करने में गर्व महसूस होता है। वह चमत्कारी तरीके से उन लोगों तक पहुंचता था जिन्हें आर्थिक मदद की ज़रूरत थी।

धोकेबाजी से गिरफ़्तारी


टंट्या को उसकी बहन के पति गणपत के विश्वासघात के कारण गिरफ्तार किया गया। उन्हें इंदौर में ब्रिटिश रेजीडेंसी क्षेत्र में सेंट्रल इंडिया एजेंसी जेल में रखा गया था। बाद में उन्हें सख्त पुलिस पहरे के तहत जबलपुर ले जाया गया। उन्हें बाद में जबलपुर जेल में रखा गया जहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया। उस पर सभी प्रकार के अत्याचार किए गए। सेशंस कोर्ट, जबलपुर ने उन्हें 19 अक्टूबर 1889 को फांसी की सजा सुनाई।

सम्मान


ब्रिटिश सरकार इतनी डरी हुई थी कि आज भी यह पता नहीं चल पाया है कि उसे कब और किस तारीख को फांसी दी गई। आमतौर पर यह माना जाता है कि फांसी के बाद उसका शव इंदौर के पास खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया गया था। जिस स्थान पर उनके लकड़ी के पुतले रखे गए थे, वह तांत्या मामा की समाधि मानी जाती है। आज भी सभी ट्रेन चालक टंट्या मामा के सम्मान के रूप में एक पल के लिए ट्रेन को रोक देते हैं।


टंट्या भील की गिरफ्तारी की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स के 10 नवंबर 1889 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। इस खबर में उन्हें "भारत के रॉबिन हुड" के रूप में वर्णित किया गया था।




टंट्या अंग्रेजों को सबक सिखाना चाहते थे और समाजवादी समाज के भीलों के सपने को साकार करना चाहते थे। उन्हें भारत को ब्रिटिश अधीनता से मुक्त करने के जुनून को डेस्क के बाकी जनता तक भी पहुंचने का काम किया था | पर आज भी काफी काम हिंदुस्तानी टंट्या के बारे में जानते है | 

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