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जिसको भी देखू परेशान नज़र आता है




जिसको भी देखू परेशान नज़र आता है
आज क्यू इंसान ना इंसान नज़र आता है

चैन ओ सुकून से भरे मकाँ की चाहत
वो ना तो सुबह को ना शाम नज़र आता है

पहेलियाँ बन गई है आज वो गालियाँ
नुक्कड़ पर खेलता वोहि बहपन नज़र आता है

जब भी लिखता हूँ ग़ज़ल बेसबब होके
दर्द अपना ज़माने का नज़र आता है


सुना था कभी किताबों में बहुत नाम जिसका
मोहब्बत का हर रंग बेरंग नज़र आता है

ज़िंदगी गुज़र जाती है जिन सवालों के पीछे
जब मिलता है जवाब फिर सवाल नज़र आता है

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