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मन के हारे हार है ? या...(सच्ची घटना से प्रेरित)



कुछ कहानिया जैसे छाप सी बनके हमारे जीवन मे उतर जाती है । ये वे कहानिया होती है जो यातो सबक देती है या बैचेनी, पर जो भी हो होता है वो जीवन पर्यन्त के लिए ही होता है | पर कुछ कहानिया इससे भी परे होती है जो बेचेनी और सबक दोनों ही दे जाती है | मेरे भी जीवन मे एक ऐसी घटना घटी जो बेचेनी और सबक बनके मेरी जिंदगी मे छप गयी |

ये बात उन दिनों की है जब मै कक्षा १० का छात्र रहा होगा  । वैसे तो आजकाल अगर १५-१६ साल के बच्चो को देखे तो थोड़े ज्यादा समझदार नज़र आते है । । समझदार नहीं तो कम से कम सोशल मीडिया की बजह से दुनियादारी तो जान ही जाते है । वक़्त भी फ़ास्ट एंड फॉरवर्ड हो गया है । पर अगर मै मेरी बात करुँ तो मेरे में ज्यादा समझदारी नहीं थी और बहुत से कामो के लिए मै घरवालों की मदद ही किया करता था । पढ़ने मे भी औसत ही था ।

मुझे अच्छी तरह से याद है बहुत ही अच्छा दिन था । मैं  बड़े भाई के साथ कक्षा ११ मे दाखिला लेने गया हुआ था । वापस लौटते मे हमने समोसे का नास्ता किया और घर की ओर  निकल पड़े । घर पहुंचने के लिए हमे एक जगह से राइट साइड मुड़ना था पर हम वहां से मुड़ नहीं पाए क्योंकि वहां पुलिस वाले चेकिंग कर रहे थे।  और दूसरे रास्ते से मुडने के लिए आगे बढ़ गए ।

वैसे तो वो रास्ता चालू रहता था पर उस दिन उस रास्ते पे एक भी गाडी नहीं थी ये मैंने बाद मे ऑब्जर्व किया । आते समय तो हम नार्मल ही चले आ रहे थे । थोड़ा आगे जाकर हमने देखा की एक ट्रेक्टर तेजी से चला जा रहा है नॉर्मली ट्रेक्टर की स्पीड थोड़ी धीमी होती है पर उसकी स्पीड थोड़ी ज्यादा थी जिससे कोई भी आसानी से पता कर सकता है कि कुछ करके ही आया है ये ट्रेक्टर । थोड़ा आगे जाने पर देखा एक व्यक्ति ट्रेक्टर के पीछे दौड़ता हुआ आ रहा है । ओर किसी भी कीमत पर ट्रेक्टर वाले को पकड़ना चाहता था। 

हमारी सासें बढ़ चुकी थी और किसी अनहोनी की असंका होने लगी थी । पर अभी तक ये क्लियर नहीं हुआ था की हुआ क्या है।थोड़ा और आगे जाने पर सारा माजरा साफ़ हो गया।  वो ट्रैक्टर एक बाइक वाले को टक्कर मार के भाग रहा था और पीछे दौड़ने वाला शायद उसका पिता रहा होगा।
हमारे दिल बहुत तेजी से धड़क रहे थे। हम साइड मे रुके वहां हम थे और बाइक वाला था और कोई भी नही था न कोई आता दिख रहा था। हमारा पहला विचार उसकी सहायता का ही था इस कारण हम वह रुके थे पर अचानक से जाने क्या हुआ हमारा विचार बदला और हमने इस पचड़े मे न पड़ने का मन बनाके भागने लगे। मेरा मन बोल रहा था कि मुझे उसकी मदद करनी चाहिए। पर दूसरी तरफ दिमाग कुछ और ही बोल रहा था। मुझे अच्छी तरह याद है उस बन्दे का चेहरा खून से लथपत और मुझे बोल रहा था की भाई हॉस्पिटल पास मे ही है बस वह तक छोड़ दो। पर हम दोनों भाग गए उसको उसके हाल पे छोड़ कर। मुझे आज भी विश्वास नही होता है कि हम वहां से भाग गए थे ।

दिल मे हजारो आशंकाए अभी भी चालू थी। दिल सोच मैं डुबा हुआ था । काश आज आते ही नही। काश समोसे नही खाते । काश पहले वाले रास्ते से मूढ़ जाते । काश उसकी मदद कर देते। ये खयाल आते ही मेरे भाई ने स्कूटर वापस मोड़ा । हम वापस जा रहे थे उसकी मदद करने। दिल भट्टी बना हुआ था। वहां पहुच कर देखा वहां तो कोई नही था। ना मोटर साईकल न वो दोनों। कहाँ गए वो दोनों। क्या हमें बहुत समय लग गया लौटने मे। इन सब सवालो के जबाब देने के लिए वह कोई नही था।

ये संजोग ही था उसके लिए भी और हमारे लिए भी, की हम वहां अकेले थे। शायद वो परीक्षा का छड़ था जिसपर हम खरे नहीं उतरे । मुझे नहीं पता उसका क्या हुआ होगा वो बचा या चला गया । पर ये बेचेनी जिंदगी भर के लिए रह गयी कि उसका हुआ क्या होगा। अगर मैंने उस दिन दिमाग की न मान के दिल की बात मानी होती तो शायद आज कुछ और ही कहानी होती। और पक्का पता होता की वो बच गया । ये एक बहुत बड़ा सबक बनके मेरी जिंगदी मे समा गया है । हमेशा दिमाग की ही नहीं सुननी चाहिए। कुछ जगह मन की सुनना बेहतर है।

लगभग 20 साल इस बैचैनी मे तड़पने के बाद मुझे कुछ राहत तब मिली जब मैंने ये वाकया मेरी पत्नी को सुनाया। ओर मेरी बैचेनी की बारे मे बताया। एक बहुत ही अच्छी बात उन्होंने कही मेरी कहानी सुनने के बाद

जो हुआ उसे बदला नही जा सकता पर हम ये दुआ कर सकते है कि वो उस दिन बस सलामत से हॉस्पिटल पहुच गए हो। ओर जहां कही भी हो सही से हो।

सच मे मन के हारे हार है और मन केके जीते जीत। ये बिल्कुल सार्थक साबित हुआ है मेरे लिए।

आपको इस घटना से क्या समझ आया । कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। ज्यादा से ज्यादा दोस्तो से शेयर करे जिससे वे जरूरत पड़ने पर सही निर्णय कर पाए। 


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