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Sunday, January 20, 2019

क्या भय ही सभी ईर्ष्याओं की जड़ है? कहानी महाभारत से
















ईर्ष्या ही हमारा वह गुढ़ है जो हमे ये दिखाता है कि अन्य हमसे 
बेहतर है और हम उसके अपेक्षा कम बेहतर है। इसी अवगुड़ के कारण ही 
हम खुद को हानि की दृष्टि से देखने लगते है। वैसे तो इंसान मैं ईर्ष्या पैदा होने
के अनंत कारण हो सकते है।पर भय सबसे प्रमुख कारण है। 
जब हमे ये भय होता है अन्य हमारे क्षेत्र पर अतिक्रमण कर सकता है और 
हमारी शक्ति पर्याप्त नही होगीउसे रोकने मे, तो हम उससे ईर्ष्या करने लगते
है
महाभारत में भी इसी प्रकार की ईर्ष्या से विवाद पैदा होने का वर्णन है। 
हस्तिनापुर के राजा पाण्डु को एक अभिशाप मिलता है, फलस्वरूप वह 
अपनी पत्नियों से सम्भोग करने और उनसे बच्चे पैदा करने में असमर्थ हो 
जाता है। इसके बाद वह वन में रहने के लिए चला जाता है। उसकी दोनों 
पत्नियाँ कुंती और माद्री भी उसके साथ वन चली जाती हैं। 

तब कुंती उन्हें इस अभिशाप से बचने का उपाय बताते हुए कहती है
 कि ‘मेरे पास एक ऐसा मंत्र है जिससे मैं किसी देवता का आह्वान करके 
उसे मुझे एक पुत्र देने के लिए बाध्य कर सकती हूँ।’ पाण्डु इस उपाय का 
प्रयोग तब तक नहीं करता जब तक कि वह यह नहीं सुनता कि उसका बड़ा 
भ्राता अंधा धृतराष्ट्र, जो अब हस्तिनापुर का शासक बन गया है, की पत्नी 
गांधारी गर्भवती है। 

उसके मन में भय जागृत हो उठता है की अगर उसकी संतान नही हुई तो 
उसके कुल का नाश हो जाएगा। वह कुंती से उस मंत्र का लाभ उठाने के 
लिए आग्रह करता है। 

वह यम, वायु और इन्द्र का आह्वान करती है तथा उनसे युधिष्ठिर, भीम और 
अर्जुन को पैदा करती है। पाण्डु उससे और पुत्र पैदा करने के लिए कहता है, 
परन्तु कुंती कहती है कि वह इस मंत्र का प्रयोग तीन बार से अधिक नहीं कर 
सकती। इसलिए पाण्डु उससे इस मंत्र के विषय में अपनी दूसरी पत्नी माद्री 
को बताने के लिए कहता है। 

कुंती अपने पति का कहना मानती है। परन्तु वह तब उससे कुढ़ जाती है जब 
एक मंत्र का प्रयोग करते हुए माद्री दो पुत्र पैदा करने के लिए अश्वनीकुमारों 
का आह्वान करती है, जो सदैव जोड़ी में ही आते हैं। कुंती की माद्री के प्रति 
ईर्ष्या भय भय के कारण ही होती है । कुंती उसे पुनः मंत्र 
देने से मना कर देती है क्योंकि वह माद्री से अधिक पुत्रों की माता बनी रहना 
चाहती है। 

पाण्डु के पुत्रों के जन्म के विषय में जानकर गांधारी इतना घबरा जाती है कि 
वह अपनी सेविका को गर्भधारी पेट को लोहे की छड़ से मारने का आदेश 
देती है ताकि उसका बच्चा बाहर निकल जाये। इसके बावजूद वह एक मांस 
के गोले को जन्म देती है जो लोहे के समान ठंडा होता है। वह ऋषि व्यास की 
सहायता से उसके टुकड़े कर के उन्हें सौ पुत्रों में बदल देती है, जो माद्री से 
अठानवे तथा कुंती से सतानवे अधिक हैं ताकि वह अपनी और अंततः अपने 
पति की श्रेष्ठता स्थापित कर सके।

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